Ravindra Tripathy

रवीन्द्र त्रिपाठी

Playwright · Critic of literature, film, theatre and art · Filmmaker · Cultural activist · Satirist

Writing across Indian cultural life — essays, criticism and commentary in Hindi.

Literature

साहित्य

Film

सिनेमा

Theatre

रंगमंच

इस खंड में लेख शीघ्र जोड़े जाएंगे।

Essays in this section are on their way.

Satire

व्यंग्य

इस खंड में लेख शीघ्र जोड़े जाएंगे।

Essays in this section are on their way.

Art

कला

इस खंड में लेख शीघ्र जोड़े जाएंगे।

Essays in this section are on their way.

← Literature / साहित्य

एक काव्यात्मक खयाल

(`दूर देश के परिंदे’ को लेकर कुछ विचार विंदु)

क्या कोई ऐसा उपन्यास हो सकता है जो कविता को समझने में मदद करे, आपको कविता का आस्वादक बना दे? सिर्फ हिंदी कविता का ही नहीं, सिर्फ छायावाद या सूर्यकांत त्रिपाठी `निराला’ की कविताओं का ही नहीं बल्कि वर्ड्सवर्थ, ज़ॉन कीट्स, शेली सहित अन्य अंग्रेजी कवियों का भी। जर्मन कवि रेने मारिया रिल्के की कविताओं का भी। यानी उपन्यास पढ़ते हुए आप कविता के सहदय बन जाएं! चलिए आगे बढ़ें। क्या कोई ऐसा उपन्यास लिखा जा सकता है जो रोमां रोला के उपन्यास `ज्यां क्रिस्तोफ’ के प्रमुख चरित्र ज्यां क्रिस्तोफ को भारत में रमता जोगी या `जोगिया बटोहिया’ बना दे? क्या कोई ऐसे उपन्यास की रचना हो सकती है जो महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, बाबा साहब अंबेडकर जैसे व्यक्तित्वों को एक ऐसी कहानी में पिरो दे जिससे भारतीयता की एक ऐसी तस्वीर बन जाए जो आज के राष्ट्रीय विमर्श के लिए जरूरी बन जाए। क्या कोई ऐसा उपन्यास लिखा जा सकता है कि जिसके माघ्यम से आप गौहर जान जैसी तवायफ- गायिका की जिंदगी से जुड़ जाएं? क्या किसी ऐसे उपन्यास की कल्पना की जा सकती जिसमें इतिहास के वास्तविक पात्र यथार्थ रूप में भी आएं और कल्पित चरित्र में ढलकर भी। मतलब यथार्थ औऱ कल्पना दोनों एक साथ। क्या एक ऐसा उपन्यास भी हो सकता है जिसमें भारतीय स्वाधीनता संग्राम से जुड़े कई मसले आप को एक भारतीय के नाते आत्मसाक्षात्कार की तरफ ले जाएं और उस दिशा में भी सोचने के लिए प्रेरित करें कि दुनिया में इस्लामोफोबिया के नाम पर क्या क्या हो रहा है? अर्थात् आप भारतीय भी बने रहें और साथ ही विश्व नागरिक भी बन जाएं।

इन और ऐसे कई सवालों का उत्तर है - हां। और जिस एक ही उपन्यास में यह सब संभव संभव हुआ है उसका नाम है- `दूर देश के परिंदे’। इसे लिखा हैं वरिष्ठ कवि और कथाकार अनामिका ने। वैसे अनामिका ने पहले भी कुछ उपन्यास लिखे हैं।

इस उपन्यास में अद्भुत कथारस है। काव्यरस है। संगीत रस है। तंत्र रस है। अध्यात्म रस है। वृहत्तर राजनीति का रस है। बदलते वक्त के साथ भारतीयता को पुनर्नवित करने का सिद्धांत रस है। और तो और, इसमें स्वाद रस भी है। जी हां, इसे पढ़ते हुए आप मुजफ्फरपुर की लीची खाने के लिए तो अकुला ही सकते हैं, साथ ही बिहारी व्यंजन पियजुआ (या प्याजी) का स्वाद लेने के लिए आपका मन मचल सकता है। अगर आप बिहारी हैं या बिहारी मूल के हैं तो संभव है इसे पढ़ने के दौरान प्याजी खाने लिए शर्ट पैंट पहन कर किसी पटरिया रेस्तरां की खोज में निकल भी जाएं। (शर्ट पैंट अब लड़कियां और महिलाएं भी पहनने लगीं है तो इस अभिव्यक्ति को कृपया जेंडर से न जोड़ें। वैसे भी कई भाषाओं की तरह हिंदी वाक्य रचना के स्तर पर पुरुष केंद्रित भाषा है जिसे आप इस लेख में भी अनुभव कर सकते हैं।) और हां इस उपन्यास से गुजरते हुए आप मवेशी-बगुले जैसे पक्षी के बारे में जिज्ञासु हो सकते हैं जो देश में कुछ जगहों पर पाए जाते हैं। और यदि आप विश्व उपन्यास के पाठक हैं तो कुछ स्थलों पर आपको पुर्तगाली उपन्यासकार जोस सरामागो के उपन्यास `द इयर और द डेथ ऑफ रिकार्डों रीस’ की याद आ सकती है। सरामागो के इस उपन्यास में पुर्तगाली कवि फरनांदो पेसोवा के दो उपनामों (पेसोवा के कई उपनाम थे) के बीच क्या घटता है उसकी कहानी है। और अगर नहीं पढ़ा तो उसे पढ़ने के लिए यह उपन्यास उकसा सकता है। आखिर एक अच्छी रचना दूसरी अच्छी रचना से जोड़ने के लिए एक सेतु का काम भी तो करती है। है कि नहीं? गंगा के तीर पर चलते चलते आपको नर्मदा के तीर पर जाने की इच्छा हो सकती है।

जैसा कि शुरू में ही संकेत किया गया गया है - इस उपन्यास के केंद्र में रोमां रोला के उपन्यास का चरित्र ज्यां क्रिस्तोफ है। वह भारत आता है और यहां के उस आभ्यंतर में प्रवेश करना चाहता है जिसमें गांधी, टैगोर, डा अंबेडकर, मीरा बेन, स्वामी राम जैसे व्यक्तित्व रहे। उसके भारत आने का एक कारण हिमालय में स्थित उन योगपीठों पर भी जाना है जो साधना पीठ भी हैं। ये वही पीठ हैं जिनके बारे में ब्रितानी भारतविद और तंत्र-योग के गहरे अध्येता जॉन वुडरफ ने अपनी रचनाओं में चर्चा की है। लेकिन वहां जाने के पहले क्रिस्तोफ लखनऊ, शांतिनिकेतन, मुजफ्फरपुर आदि कई जगहों पर जाता है और वहां लंबा वक्त बिताता है। लखनऊ में वह `निराला’ जी से मिलता है और उनके साहित्य के अध्येता और आलोचक राम विलास शर्मा से भी। निराला की पुत्री सरोज से भी उसकी मुलाकात होती है जिसके निधन के बाद कवि ने `सरोज स्मृति’ जैसी कविता भी लिखी। वो `चतुरी चमार’ से भी मिलता है जो निराला की रचना के केंद्र में है। शांति निकेतन में उसका विद्योत्तमा मुखर्जी नाम की एक लड़की से प्रेम भी होता है जो अव्यक्त ही रह जाता है। वहां हिंदी के विद्वान और उपन्यासकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के सानिध्य में भी वह काफी वक्त बिताता है। लंबे समय तक भारत में रहते हुए उसने अपनी डायरी भी लिखी जो इस उपन्यास में विभिन्न कथा प्रसंगों को जोड़नेवाला है। वैसे उपन्यास का ढांचा कुछ ऐसा रखा गया है कि इसके कई चरित्र बतौर लेखक अपने अपने अनुभव और दृष्टिकोण से कथा को संयोजित करते हैं और आगे बढाते हैं, जैसे क्रिस्तोफ, विद्योत्तमा (जिसके माध्यम से हम गौहर जान के कुछ वास्तविक पर अधिकतर काल्पनिक जीवन प्रसंगों से जुड़ते हैं, क्योंकि विद्योत्तमा प्लैंचेट पर गौहर की आत्मा से संवाद करती है), रोमां रोला, मीरा बेन (यानी मैडलीन स्लेड, जो इंग्लैंड की थी पर गांधी जी से इतनी प्रभावित हुईं कि भारत की आजादी की लड़ाई में उनकी सहयोगी बनीं और आगे चलकर पृथ्वी सिंह से शादी की) और रानू मुखर्जी, जो टैगोर की करीबी थीं औऱ उनको लेकर तब कई प्रवाद भी फैले थे। उन प्रवादों की झलक भी यहां है।

अक्सर उपन्यास को लेकर ये सामान्य धारणा रही है कि उसमें उपन्यासकार का निजी स्व नहीं होता है, वह औरों के बारे में होता है उसमें दूसरों के स्व होते हैं। हालांकि वैकल्पिक धारणा यह भी रही है कि उपन्यासकार के जीवन के अनुभव भी इसमें होते हैं या हो सकते हैं। लेकिन लिखे जाने के बाद वों दूसरों के अनुभवों के हिस्से भी बन जाते हैं। व्यक्तिगत सामान्यीकृत हो जाता है। लेकिन अपने इस उपन्यास में अनामिका खुद भी मौजद हैं और उनके माता- पिता भी। अनामिका की मां आशा किशोर और पिता श्यामनंदर किशोर भी इस उपन्यास के पात्र हैं। दोनो हिंदी के विद्वान और अध्यापक रहे। मुजफ्फरपुर में। स्वभावत: इस उपन्यास में मुजफ्फरपुर भी है और हिंदी अकादमिक जगत की कुछ बातें भी।

पहले मुजफ्फरपुर शहर की बात कर लें। वैसे तो यह लीची शहर के रूप में ख्यात है पर यहां कई तरह की सांस्कृतिक और धार्मिक अंतक्रियाएं भी हुईं हैं। उनके बारे में हमें यहां जानाकारी मिलती है। यहां एक सूफी दरगाह भी है जो हिंदुओं के बीच भी सम्मानित रहा है। उपन्यास में उस दरगाह से जुड़ी किंवदंतियां भी है। हालांकि कुछ लोगों के लिए, जिसमें उपन्यासकार भी हैं, ये किवंतदियां वास्तविक प्रसंग भी हैं। पाठक को लग सकता है कि क्या सच में ऐसा हुआ! तार्किक लोग कहेंगे - ऐसा कैसे हो सकता है? या ये तो धार्मिक विश्वास भर है, अंधविश्वास के करीब। पर यह उपन्यास तर्क के परे कुछ अनुभवों की बात भी करता है। यही तो थियोसॉफिकल सोसाइटी और तंत्रविद्या के जानकार भी करते हैं। ज़ॉन वुडरफ ने तो उन सबके बारे में लिखा है। महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज को पढ़ते हुए भी हम वैसे ही प्रसगों से दो-चार होते हैं।

अब आते हैं हिंदी अकादमिक जगत वाले पहलू पर। आशा किशोर भक्तिकालीन कविता पढ़ाती थीं। सूरदास की एक कविता है - `मेरो हरि हारिल की लकड़ी’। आशा किशोर ने अपनी पुत्री को इसकी व्याख्या करते हुए बताया था हारिल एक चिड़िया है जो ` आसमान की तरफ पैर उठाकर सोती है और उस दौरान पैरों के बीच एक लक़ड़ी रख लेती है। शायद उसे यह लगता हो कि दिन में तो वह जगी रहती है - अपने घोंसले की रक्षा में तैनात! रात में झपकी आ जाती है, झपकी के दौरान आसमान टूट गिरा तो? यह लकड़ी जो उसके पंजों में फंसी है,वही संभाल लेगी, रोक लेगी आसमान को धरती पर गिरने से! एक तरह से वो डिप्यूट करती है पंजों में फंसी लकड़ी को कि जब तक मैं झपकी लेती हूं, तुम मेरे बच्चों और दुनिया के सारे बच्चों का ध्यान रखना!‘

लेखिका की मां हिंदी पढ़ाती थी, लेकिन वे खुद अंग्रेजी की अध्यापिका रही हैं। स्वभावत: इस उपन्यास को पढ़ते हुए आप कई जगहों पर कुछ अंग्रेजी कविताओं के मर्म से भी परिचित होते हैं। यहां सिर्फ एक का उल्लेख किया जा रहा है जो इस उपन्यास के उत्तरार्ध में आता है। कविता ए ई हाउसमैन की है जिसकी ये पंक्तियां इसमें पढ़ने को मिलती हैं-

That is the land of lost content
Not much is taken , much abides
To seek, to find and not to yield

(हिंदी अनुवाद- लेखिका का ही है)

यह जमीन है खोए हुए लक्ष्यों की
बहुत नहीं छीना जाता, काफी बच जाता है
ढूंढने पाने की खातिर, तना रहने की खातिर)

कोई पूछ सकता कि आखिर क्या कहा गया है इन पंक्तियों मे? क्या है जो काव्यांश के शब्दार्थ से परे है? क्या है इन पंक्तियो की ध्वनि? आलोचक इसकी अलग अलग तरह से व्याख्या कर सकते हैं। मेरी व्याख्या यह है कि जीवन में अक्सर कुछ लोग या संगठन यह कहते हुए पाए जाते हैं कि हमारा देश दूसरों के द्वारा किए गए आक्रमण के कारण क्षत विक्षत हो गया। इतिहास को पढ़े तो कुछ हद तक सही भी है। लेकिन क्या सचमुच पूरी तरह क्षत विक्षत हो गया या कुछ बचा भी रह गया। मेरा तो मानना है कि बहुत कुछ बचा रहा गया। और खुद इंग्लैंड भी इसका गवाह है जिसका लगभग सौ से अधिक साल तक भारत उपनिवेश रहा। इंग्लैंड खुद भी सैकड़ों बरसों तक उपनिवेश रहा। कभी रोम का, कभी वाइकिंग का तो कभी नॉर्मंडी का। लेकिन इंग्लैंड खत्म नहीं हुआ। वह बचा रहा और आज भी बचा रह गया है। क्या ऐ ई हाउसमैन इसी ओर संकेत कर रहे थे? बिना इतिहास का प्रत्यक्ष उल्लेख किए हुए। क्या कविता का सच इतिहास के सच से जुड़ा होते हुए भी उससे आगे चला जाता है?

हिंदी में जो उपन्यास विमर्श रहा है उसका एक पक्ष यह भी रहा है जो मानता रहा कि उपन्यास एक विदेशी विधा है, पश्चिमी विधा है और ये भारतीयता के सांचे में ठीक से ढल नहीं पाया है। हालांकि इसका प्रतिपक्ष भी रहा है जो प्रेमचंद से प्रेरित होकर उपन्यास को किसान गाथा के लिए उपयुक्त पाता है। पर यहां भी पश्चिम अनुपस्थित नहीं रहता है। जो उपन्यास जो किसान गाथा के लिए उपयुक्त मानते हैं उनका कहना होता है कि पश्चिम में उपन्यास मध्य वर्ग की गाथा के रूप में अवतरित हुआ और भारत में किसान गाथा के रूप में। इस तर्क पद्धति में कई तरह के सरलीकरण हैं।

यहां उस सबमें विस्तार में जाने का वक्त नहीं है और मात्र इतना संकेत करना ही पर्याप्त होगा कि हर उपन्यासकार, हर भाषा औऱ हर देश का उपन्यासकार अपनी रचनाओं में उपन्यास को नए ढंग से आविष्कृत करता है। हिंदी में भी अलग अलग उपन्यासकारों ने ऐसा किया है और कर रहे हैं। अनामिका ने भी `दूर देश के परिंदे’ को अपनी निगाह से कल्पित किया है जिसमें आप कथास्वाद के साथ साथ काव्यास्वाद भी पाते हैं, कई स्थलों पर दोनो घुलमिल जाते हैं।

मिर्जा गालिब का शेर याद आता है-

आगही दामे शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दा अंक़ा है अपने आलमे तकरीर का

प्रश्न ये उठेगा और उठना चाहिए भी आखिर कि अनामिका इस उपन्यास के माध्यम से कहना क्या चाहती हैं? इतने तरह के चरित्र और ऐसे ऐसे वाकये जो वास्तविकता के धरातल पर परस्पर संबद्ध नहीं है वो सब इसमें क्यों हैं? हालांकि इसका सीधा-सा उत्तर तो यही है कि इस प्रश्न का औचित्य क्या है? इसलिए कि लेखक का मंतव्य तो उसकी रचना में निहित होता ही है और उसे पढ़ते हुए पाठक को पता चल जाता है कि उसे क्या हासिल हुआ। लेकिन यहां मामला इतना आसान नही है। बाज दफा एक रचना में कई प्रकार के विमर्शों का समावेश होता है जिनको अलग अलग चीन्हना भी जरूरी होता है साथ ही उनके बीच एकसूत्रता को देखना भी। हम भारतीय जिस समय में रह रहे हैं उसमें कई तरह की बहसें चल रही हैं। इसी को वीएस नायपाल ने अपनी यात्रा पुस्तक `इंडिया - ए मिलियन म्यूटिनिज नाउ’ में पहचानने की कोशिश की थी। जब यह किताब आई थी तब से भारत में कई तब्दीलियां हो गई हैं। कई नई वैचारिकताएं आ गई हैं जो आम भारतीय को उद्वेलित कर रही हैं। ग्लोबलाइजेशन के कारण भी कई उलझनें पैदा हुई हैं। उनमें से कुछ को अनामिका ने इस उपन्यास के माध्यम से एक ऐसा परिप्रेक्ष्य देने की कोशिश की है जो उद्वेलित भारतीयों को एक सम्यक दृष्टि दे सकती है। आइए, इनमें से कुछ की चर्चा यहां करते हैं।

पहला तो भारतीय स्वाधीनता संग्राम में गांधी बनाम अंबेडकर, गांधी बनाम सुभाष जैसे मसले है। आज भी ये भारतीय राजनीति और समाज के सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दों में हैं। इन्हें लेकर कई बहसें चल रही हैं जिनसे कटुताएं भी पैदा हो रही है। लेकिन अनामिका एक सदभावपूर्ण दृष्टि प्रस्तावित करती हैं। यह सही है कि आजादी की लड़ाई के दौरान गांधी- अंबेडकर में मतभेद हुए। गांधी -सुभाष के मध्य भी। यहां तक कि गांधी और टैगोर के बीच भी। मगर उपन्यास इन बहसों और मतभेदों को रेखांकित करते हुए एक सामान्य भूमि की भी तलाश करता है। वही उसका मुख्य लक्ष्य है। विजय देव नारायण साही की भाषा में कहें तो यह उपन्यास `संतुलन का नाटक’ वाले सिद्धांत का प्रतिपादन करता है। आखिर स्थायी वैमनस्य से तो देश नहीं चलेगा। हमें यह याद रखना चाहिए कि इन सबके बीच भारत आजाद हुआ और स्वतंत्र देश बना। और फिर संविधान के माध्यम से अनेकता में एकता की स्थापना में लगा रहा। हालांकि भारतीय समाज में टकराहटें अभी भी हैं। धर्म और संप्रदाय के नाम पर सामाजिक विभाजन की प्रकिया भी चलती हुई दिख रही है। पर क्या एकता और बंधुत्व की वकालत करनेवाले स्वर भी नहीं हैं?

बीसवीं और इक्कीसवीं दोनों सदियां हिंसा और बर्बरता की सदियां भी रही हैं। दो दो विश्व युद्धों और कई अन्य युद्धों की सदियां रही है। दूसरे विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद शीत युद्ध का समय भी आया। उसके खत्म होने के बाद भी कई देशों के बीच युद्ध चल रहे है। कुछ देशों में तो गृहयुद्ध हो रहे हैं। आज की तारीख में यानी 2026 में ईरान औऱ अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध हो चुका है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वहां युद्ध विराम है। लेकिन कब तक रहेगा यह कोई नहीं कह सकता। सैंमुअल हटिंगटन जैसे सिद्धांतकार ने तीन दशक पहले यह लिखा था कि शीत युद्ध के बाद संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान ही टकराव औऱ युद्ध का कारण होगा। हालांकि इस सिद्धांत के विरोध में भी काफी कुछ लिखा गया पर यह भी सही है कि पूरी दुनिया में आज जो इस्लामोफोबिया है उसके मूल में मुख्य रूप से हटिंगटन द्वारा प्रतिपादित धारणा भी है। क्या सभ्यताओं का यह संघर्ष जारी रहेगा? अगर सब जारी रहता है तो भारत कहां होगा?

यह उपन्यास इसका भी संज्ञान लेता है। वह भी पारंपरिक भारतीय के मुहावरे में। ज्यां क्रिस्तोफ को हिमालय वासी बंगाली बाबा चक्रवर्ती महाशय की चिट्ठी मिलती है जिसमें लिखा है- `कई बार हम महज घबराहट में विरोधाभासी अवयवों/ प्रकल्पनाओं/ प्रस्तावों को आपसे में गूंथनेवाला प्रछन्न सूत्र देख नहीं पाते। शंकराचार्य को `प्रछन्न बौद्ध’ पुराने पंडित हिकारत भरे स्वर में कहते थे, पर ठीक से देखा जाए तो अद्वैत और बौद्ध दर्शन सगोत्र तो हैं ही। क्यों न हों? सत्य का हिमालय तो एक ही है- उसी हिमालय से अलग अलग नदियां फूटी हैं, अलग अलग धार्मिक संप्रदाय, चिंतन पद्धतियां! अब समय आ गया है सब धर्मों की आधारभूत प्रपतियां रेखांकित की जाएं और जिस तरह सामाजिक / राजनैतिक क्रांतियां हुईं, हर धर्म आत्मक्राति करे........ यही करते रहे विवेकानंद, थियोसॉफिकल ऑफ इडिया के सब महर्षि, महर्षि अरविंद, महर्ष योगानंद और महर्षि रमण।‘

आगे बंगाली बाबा के पत्र में यह भी है - `अगर सभ्यता संवाद न हुआ तो सभ्यता संघात ही होगा जैसे विश्वयुद्ध के दौरान हुआ या शीत युद्ध के दौरान’। गौहर जान भी एक जगह कहती है- मेरे जानते हुए यह समय सभ्यताओं के फ्यूजन का है, संभ्यता संवाद का’।

यह अलग से कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि `दूर देश के परिंदे’ सभ्यता संवाद के पक्ष में खड़ी रचना है और सभ्यता संघर्ष की धाऱणा के विरूद्ध।

एक और विंदु की ओर संकेत करना प्रासंगिक होगा। वह है समाज में औऱत का मसला। इसी कारण फेमिनिज्म अर्थात नारीवाद का विचार औऱ सिद्धांत पैदा हुआ और फैला। फेमिनिज्म की कई व्याख्याएं हैं पर सबके मूल में पितृसत्तात्मक समाज में औरत की स्थिति का संधान है और उसकी आजादी है। यह तो सर्वविदित है कि अन्य देशों की तरह भारत में भी लंबे समय तक स्त्रियां उपस्थिति होते हुए भी अनुपस्थित थी। आज भी बहुत हद तक हैं। स्क्रोडिंजर्स क्लॉज की तरह। परिवार में भी, समाज में भी। उपन्यास में एक प्रसंग आता है कि ज्यां क्रिस्तोफ जब हिमालय जाने के पहले अपनी रचना की पांडुलिपि विद्योत्तमा के घर जाकर देता है तो समस्या आती है वह उसे कहां छुपाए। इसलिए कि वह नहीं चाहती कि उसके पति की नजर उस पर पड़े। और तभी उसे एहसास होता है कि उसके घर में कोई ऐसा कोना नहीं है जो सिर्फ उसका अपना हो।

यह छोटा सा प्रसंग पारंपरिक भारतीय समाज में औरत की स्थिति को सामने लाता है। जैसे जैसे उपन्यास आगे बढ़ता है यह बात भी उभरती है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि उसने महिलाओं को एक सामाजिक और राजनैतिक भूमिका दी। राष्ट्रीय जीवन में कोने दिए। सरोजिनी नायडू से लेकर कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसे व्यक्तित्व इसके उदाहरण हैं।

अंत में इस उपन्यास के नाम पर आते हैं। `दूर देश के परिंदे’ सिर्फ नाम नहीं है। यह एक दर्शन है। इस दर्शन में भारतीयता भी है और वैश्विकता भी। और दोनो अविरोधी है। कभी रवीन्द्र नाथ टैगोर ने चार्ली एंड्र्यूज (जिनको भारत में दीनबंधु भी कहा गया) को लिखे पत्र में कहा था कि दुनिया में जो भी चीज हमें आनंद देती है वो हमारी है भले ही उसका उत्स विदेशी हो (इसका उल्लेख अमर्त्य सेन ने अपने एक लेख में भी किया है)। चार्ली एंड्र्यूज भी विदेशी थे पर वे भारतीय भी बन गए। मीरा बेन इंग्लैंड की थीं लेकिन भारतीय बन गईं और अपने ही उपनिवेशवादी देश के खिलाफ चली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लडाई में शामिल हुईं। गौहर जान का जर्मन प्रेमी फ्रेडरिक (हालांकि वह भी कल्पित चरित्र ही है) आध्यात्मिक एक स्तर पर भारतीय हो जाता है। संगीत से लगाव के कारण। वैसे महात्मा गांधी खुद दक्षिण अफ्रीका में दूर देश के परिंदे थे। इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र ज्यां क्रिस्तोफ भी दूर देश का वह परिंदा है जो भारत आया है। थियोसोफिकल सोसाइटी की मैडम हेलेना ब्लैवत्स्की रूसी मूल की थीं लेकिन भारतीय अध्यात्म को विश्व पटल पर स्थापित करने में लगी रहीं। वह भी परिंदा ही थीं। वैश्विक भी और भारतीय भी। विदेशी भाषाओं के वे कवि, लेखक और कलाकार भी हम भारतीयों के अपने हैं जिनकी रचनाएं हमें आनंदित करती हैं। चाहे लियो तोल्सतोय हों. चेखव हों, बर्तोल्त ब्रेख्त हों।

यह उपन्यास फिलहाल देश में उभरते हुए उग्र राष्ट्रवाद के माहौल में उस उद्यान को दिखाता है जिसमें देश-दुनिया के फूल भरे हुए हैं और उनकी सुगंध भी। क्या विभिन्न प्रकार की खुशबुएं जब मिलती हैं तो एक दूसरे से पूछती हैं - तुम किस देश की हो? आपको लगेगा कि यह सब काव्यात्मक खय़ाल है। है ना? किंतु यह उपन्यास भी तो एक काव्यात्मक खयाल ही तो है।

← Film / सिनेमा

नाटकीयता से भरा एक फिल्मकार

मजरूह सुल्तापुरी का एक शेर है ( ये एक गजल में शामिल है जिसे लता मंगेशकर ने `बागी’ फिल्म में गाया भी है)-

हमारे बाद अब महफिल में अफसाने बयां होंगे
बहारे हम को ढूंढेंगी न जाने हम कहां होंगे

इस शेर की याद तब अनायास आ गई जब पिछले दिनों इंडिया इस्लामिक सेटर में ख्वाजा अहमद अब्बास (1914- 1987) पर केंद्रित दास्तानगोई देखी। इसका आयोजन किया ख्वाजा अहमद अब्बास मेमोरियल ट्र्स्ट ने जो संस्कृतिकर्मी और विदुषी सईदा हामिद की परिकल्पना है। इस दास्तानगोई को लिखा सिब्तेन शाहिदी ने जो एक मशहूर लेखक हैं। इसमें दो दास्तानगो थे - राणा और राजेश। दोनों चर्चित फनकार हैं। ये प्रस्तुति महमूद फारूकी के निर्देशन में तैयार हुई। एक प्रभावशाली दास्तान जिसने कई यादें ताजा दीं और कई मसले उठा दिए। दर्शकों को कई भूली बिसरी कहानियां याद आ गई। साथ ही कुछ अनजाने किस्से भी सुने।

पर कौन थे ख्वाजा अहमद अब्बास? अपने जमाने के नामी शख्सियत जिनकी एक प्रगतिशील विचारधारा थी, जिन्होने फिल्मी दुनिया में काफी नाम कमाया। बतौर पत्रकार भी जाने और सराहे गए। उन्होंने तब के मशहूर अखबार `बांबे क्रोनिकल’ में फिल्मों की समीक्षा लिखने से सफर शुरू किया और फिर आगे चलकर फिल्में भी बनाने लगे। कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। कइयों की पटकथाएं लिखीं। वे लबें समय तक राजकपूर के सहयोगी भी रहे और उनके लिए `श्री 420’, `आवारा’, `मेरा नाम जोकर’ से लेकर `बॉबी’ जैसी फिल्मों की कहानियां लिखीं। अमिताभ बच्चन को फिल्मी ब्रेक ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही दिया था। `सात हिंदुस्तानी’ फिल्म से। आर के करंजिया ये `ब्लिट्ज’ साप्ताहिक के लिए वे लगातार स्तंभ लिखते रहे। वे एक बहुमुखी प्रतिभा वाले शख्स थे। ऐसी कहानियां भी लिखीं जो विश्व साहित्य में याद की जाती हैं। उनकी `अबाबील’ कहानी तो दुनिया की कई भाषाओं में अनूदित हुई है। कई पुस्तकें लिखीं।

लेकिन इस मुकाम पर कैसे पहुंचे? क्या उनका रास्ता आसान था? उनकी जाती जिंदगी कैसी थी? उनकी विचारधारा क्या थी? ये और ऐसे कई सवालों के जवाब इस दास्तानगोई में मिले। सिब्तेन शाहिदी ने अब्बास साहब की जिंदगी के विस्तृत फलक को उद्घाटित करते हुए उस समय के कश्मोकश को भी सामने लाया जिससे तब का भारत गुजर रहा था और प्राचीन भारतीय संस्कृति को एक आधुनिक और प्रगतिशील मिजाज देने की कोशिश कर रहा था।

पानीपत में जन्में और अलीगढ़ विश्वविद्यालय से पढ़े अब्बास साहब अपने रोजमर्रे के जीवन में घोर नाटकीय व्यक्ति थे। खासकर अपने युवावस्था में। आज की भाषा में कहें तो कई तरह के प्रैक्टिकल जोक्स भी करते थे। दोनो दास्तानगो ने बड़े ड्रामाई अंदाज में बताया कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी छात्रावस्था के आरंभिक दिनों में एक कल्पित नारीपात्र जहांनारा के नाम से अखबारों में पत्र लिखे कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लड़कियों के लिए कोई कॉलेज नहीं है और लड़कियां अगर उच्चशिक्षा नहीं पाती हैं, तो फिर समाज कैसे आगे बढ़ेगा? तब के शहर में मुददा गरमाने लगा। तब अलीगढ़ में लड़कियां स्कूल में तो पढ़ती थीं लेकिन उसके बाद उनकी शिक्षा रूक जाती थी।

अब्बास ने कुछेक अंग्रेज अखबारों के `संपादक के नाम पत्र’ स्तंभ मे ये मसला उठाया तो वहां के बौद्धिक हलके में ये सवाल भी उठने लगा कि ये जहांनारा कौन है? अब्बास अग्रेजी में ये खत लिखते थे। तब के एक अंग्रेजी अखबार `पॉयोनियर’ के संपादक को शक हुआ। इसलिए कि खत नफीस अंग्रेजी में थे। शक का कारण ये कि जिस मुसलिम समाज में स्त्री-शिक्षा की कमी की बात की जा रही है उसमें इतनी अच्छी अंग्रेजी लिखने वाली लड़की कहां से आ गई? संपादक ने उस पते पर, जिससे खत भेजा गया था, पत्र `लेखिका’ को लिखा कि जरा अपना फोटो भेजो ताकि पता चल सके कि लिखने वाली सच में कोई लड़की ही है। अब अब्बास के सामने समस्या थी कि क्या किया जाए? फिर अपने एक दोस्त की गर्लफ्रेंड की तस्वीर जुगाड़ की। उसमें लड़की स्कूली ड्रेस में थी। अब्बास ने उस फोटो पर कलम से कुछ नक्कासीनुमा किया और लड़की को साड़ी में दिखाया। फिर उस फोटो को चार टुकड़ों में काटा, उन टुकड़ों को फिर से जोड़ा और अपने कैमरे से उसका फोटो लिया। इसलिए कि लड़की का चेहरा कुछ बदल जाए और उसकी वास्तविक पहचान सामने न आए क्योंकि ऐसा हुआ तो दूसरा बवाल हो जाएगा। फिर ये भी पता लगा लिया कि वो लड़की (तब के) कलकत्ता में रहती है जहां `पॉयोनियर’ नहीं जाता था। यानी उस लड़की या उसके परिवार को मालूम ही नहीं होगा कि क्या हो रहा है या क्या हुआ। ये सब करने के बाद अब्बास ने संपादक को लौटती डाक से फोटो भेजते हुए जवाब दे दिया - `मैं हूं जहांनारा’।

आगे चलकर अलीगढ़ में स्नातक स्तर पर लड़कियों की पढ़ाई शुरू हो गई। यहीं से रशीद जहां और इस्मत चुगतई जैसी लेखिकाएं भी आईं। लेखिका तो वे बाद में बनीं पर मुसलिम लड़कियों के लिए शिक्षा के द्वार तो खुल गए। हो सकता है कि इस द्वार के खुलने में अब्बास के इन पत्रों की सीमित ही भूमिका रही हो औऱ दूसरे कारण भी रहे हों। पर इतना भी क्या कम है? वैसे यहां ये भी बता देना जरूरी है कि ल़ड़कियों के लिए स्नातक स्तर पर पढ़ाई की शुरुआत के लिए जिस आर्थिक संसाधन की जरूरत थी वो वहां के स्थानीय व्यवसायी शेख अब्दुल्ला ने मुहैया करवाए। उनकी बेटी भी वहां पढ़ने आई जो आगे चलकर फिल्मों में काम करने गई और रेणुका देवी के नाम से कुछ भूमिकाएं भी निभाई।

इसी कड़ी में एक और वाकये को भी यहां बताना जरूरी है जिससे अब्बास के स्वाधीनता प्रेम और फितरती व्यक्तित्व का पता चलता है। तब भगत सिंह को फांसी दी गई थी जिसे लेकर देश के हर तबके में आक्रोश था। नौजवानों में खासकर। अब्बास तब भी अलीगढ़ में पढाई कर रहे थे। उन्होंने और कुछ मित्रों ने तय किया कि विश्वविद्लाय परिसर में क्वीन विक्टोरिया की जो तस्वीर लगी है उसे उतार फेंका जाए। दास्तानगोई में बताया गया कि कैसे कि अब्बास सीढ़ी लगाकर छिपते हुए उस जगह पर पहुंचे जहां क्वीन विक्टोरियां फ्रेम में मुस्कुरा रही थीं, तस्वीर को उतारा, उसे क्षत विक्षत किया और जाकर विश्वविद्यालय के अधिकारियों के दफ्तर के सामने रख दिया। बवाल मचा लेकिन कोई जान न पाया कि ऐसा किसने किया।

ऐसे फितरती थे अब्बास अपनी जवानी के दिनों में।

अब्बास का पंडित जवाहर लाल नेहरू से पहली बार मिलना भी एक ड्रामा की तरह ही था। आजादी के पहले की बात है। अलीगढ़ में अब्बास की पढाई के दौरान की ही। पंडित नेहरू ट्रेन से जा रहे थे और खुर्जा स्टेशन पर अब्बास और उनके साथी उस पर सवार हो उनसे बात करने लगे। कई बातें हुई जिनमें सबसे अहम ये थी नेहरू ने उनसे कहा- सबसे सवाल करो, अपने आप से भी और दूसरों से भी। अब्बास के अनुरोध पर पंडित नेहरू वे एक कागज पर लिख कर दिया - `लिव डेंजरसली’।

अब्बास ने पुरी दुनिया की सैर की। इस प्रक्रिया में जाना कि कहां क्या हो रहा है और दुनिया में क्या तब्दीलियां आ रही हैं। इससे उनके भीतर वो विश्वबोध निर्मित हुआ जो जमाने की मांग थी। पर उनकी जिंदगी में ऐसे लम्हे भी आए जब उनकी भावनाओं हताहत हुईं। मानसिक सदमें लगे। फिर भी उनकी वैचारिक आस्था बरकरार रही। सबसे बड़ी चोट तो तब लगी जब भारत की आजादी के समय जो दंगे हुए उनमें उनके पानीपत वाले आवास को जला दिया गया, उनकी मां को किसी तरह बचाया गया। परिवार को और भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन अब्बास अपनी निष्ठा से डिगे नहीं। तब वे मुंबई में थे। इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) में सक्रिय़ थे। प़ृथ्वीराज कपूर भी इप्टा में थे। उनके नेतृत्व ने इप्टा, उससे जुड़े कलाकारों और दूसरे लोगों ने सांप्रदायिता के खिलाफ गाते बजाते हुए एक लंबा जुलूस निकाला। अब्बास उसमें अग्रिम पंक्ति में थे। उनका घर जला मगर भारत के लिए उनका प्रेम नहीं बदला। आजादी के बाद मृत्युपर्येत वे उस भारत के वैचारिक निर्माण में लगे रहे जिसका सपना भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों ने देखा था।

अब्बास अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन जैसा कि मजरूह ने लिखा है उनके अफसाने हमारे बीच मौजूद है। और इनमें वो सपने भी मौजूद है जो अब्बास के थे लेकिन सिर्फ उनके भर नहीं थे। उस पीढ़ी के भी थे जो भारत की आजादी के लिए लड़ रही थी और फिर स्वतंत्रता मिलने के बाद वो सांस्कृतिक दुनिया बना रही थी जिसमें हर भारतीय विश्वनागरिक बन रहा था, अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान बना रहा था। अब्बास की जीवनी लिखी जानी चाहिए जिससे आज की पीढ़ी को पता चले और भविष्य की पीढ़ियों को याद रहे कि किन स्वप्नों के साथ भारत आजाद हुआ था। आज कितने लोगों को याद है कि हमारे स्वाधीनता संग्राम के मूल्य क्या थे?

इस दास्तानगोई में हंसी मजाक के लम्हे भी थे। खासकर देवानंद और बलराज साहनी से जुड़े किस्से में। अब्बास अपने मुंबई के आरंभिक दिनों में चेतन आनंद, देवानंद और बलराज साहनी जैसे लोगों से भी जुड़े थे। तब के एक वाकये का जिक्र करने हुए दोनो दास्तानगो ने बताया कि बलराज साहनी देवानंद से कहते थे- तू कभी एक्टिंग नहीं कर पाएगा। और हुआ क्या, देवानंद बड़े सुपरस्टार बन गए।